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Monday, 12 May 2025

In the end, everything will be forgotten....

A new movie, a trending web series, IPL resuming—distractions will flood in. BJP's IT cell will reclaim social media, RSS will spin the narrative into Modi's "victory" and push the Hindutva agenda. Aspirants will stress over exams again, job-seekers will return to their hustle, and these grave incidents will fade into static GK for future UPSC papers.

Everything will be buried.
Blame will quietly shift—yet again—onto the Muslim community, and internal tensions will rise as always. BJP will resume its chants of “Akhand Bharat” and “Hindus are in danger.”

But the harsh truth?
India is the one actually in danger.

We're isolated. Alone.
No global ally is standing by us in this polarized world. All those who once hailed India’s “world-class diplomacy post-2014” must now face the lie. Because when it mattered the most—we stood alone.

Believe what you want. But the diplomatic failure is real, and it’s ours.

Swati Negi

Wednesday, 17 January 2024

चीखती खामोशी

हम खामोश हैं पर फिर भी चीख है,
सूरज की तपती धूप में अंधेरों की पीड़ है।।

राहें साफ दिख रहीं हैं दूर से,
पास से कंकड़ों की सेज है,
हां बेहतर लग रही थी सारी फिजायें,
पर उन हवाओं में उजड़ी सी धूल है,
हर सुनहरी चीज़ नहीं है सोना,
उस चमक में दरारों को टीस है।

हम खामोश हैं पर फिर भी चीख है,
सूरज की तपती धूप में अंधेरों की पीड़ है।।

जीवन के सीधे सादे सफर में,
ऊबड़ खाबड़ रास्तों की खान है,
सुनसान सड़कों में न जाने क्यों,
नफ़रत का चीखों का शोर है,
काबिल हैं हम लड़ने में शायद,
तभी तुमने लगाई जंगों की भीड़ है,

हम खामोश हैं पर फिर भी चीख है,
सूरज की तपती धूप में अंधेरों की पीड़ है।।

Thursday, 11 January 2024

कुछ कुछ 💕

बहुत सारे किस्से हैं, 
बहुत सारे फसाने हैं, 
कुछ तुमसे सुनने हैं, 
कुछ तुमको सुनाने हैं, 
कुछ कागज़ों पर लिखने हैं, 
कुछ तुमको समझाने हैं, 
कुछ यादों के बादल हैं, 
जो फिर से बरसाने हैं, 
कुछ धूल हटाकर, 
फिर से मंच सजाने हैं, 
कुछ लफ्जों से बयान होगी बातें, 
कुछ आंखों से इशारे समझाने हैं, 
कुछ कुछ तो नहीं बहुत कुछ है, 
उस कुछ के अनसुलझे किस्से सुलझाने हैं।।

स्वरचित 
स्वाति नेगी

कभी कभी बस.....

कभी कभी बस नींद नहीं आती बातें काटती रहती हैं, 
रातें बांटती रहती हैं, उस दर्दभरी लम्हातों की टीस नहीं जाती, 
कभी कभी बस नींद नहीं आती।।

रातें खामोश थी पर आज शोर मचाती हैं, 
ख्वाबों की चादर फिर तेजी से उड़ जाती है, 
सवालों से पूरा दिमाग भर जाती है, 
सवालों का जवाब पूंछू तो जवाबदेही की हामी नहीं आती, 
कभी कभी बस नींद नहीं आती।।

मुकद्दर की हंसी सुनाई देती है, 
अंधेरों में सच्चाई दिखाई देती है, 
आस अभी जिंदा है या नही, 
यही उलझन और उलझती दिखाई देती है, 
सुलझाना चाहती हूं उसे पर वो हाथ नहीं आती, 
कभी कभी बस नींद नहीं आती।।

बाहर से शांत पर अंदर मन चीख रहा है, 
हर एक मुखौटे के पीछे सच छिप रहा है 
मैं हार नही मान रही तो चिढ़ रहा है 
झूठ का दलदल मुझे खींच रहा है 
एक उम्मीद अभी बाकी है जो कभी नहीं गिराती, 
कभी कभी बस नींद नहीं आती।।

इस सन्नाटों की आवाजें आती हैं, 
दिल की धड़कने बढ़ती है रूह घबराती है, 
दिमाग समझाती हूं शांत रहो नींद अभी आती है, 
चेहरे पर एक जबरदस्ती की मुस्कान लाई जाती है, 
खुद को ही लोरी सुनाकर आंखे बन्द नहीं हो जाती 
कभी कभी बस नींद नहीं आती।।

स्वरचित
स्वाति नेगी

खतरे में लोकतंत्र

वो लोकतंत्र का गला घोंट रहा है। 
हाँ लोकतंत्र अब अंतिम सांसे लेर रहा है।। 
हो रही है हर रोज़ संविधान् की हत्या, 
हर रोज मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है। 
वो लोकतंत्र का गला घोंट रहा है।।

असत्य का परचम लहराने वाले खुशहाली में खेल रहा है,
सत्य के पथ पर चलने वाला अत्याचारों के वार झेल रहा है। 
गुनहगारों पर है हल्का कानून का हाथ, 
और बेगुनाहों नाहों पर कानून को डंडा बोल रहा है। 
वो लोकतंत्र का गला घोंट रहा है।।

अदालतों में सच्चे मुकदमों में तारीख़ पर तारीख़, 
झूठे मुकदमों पर जल्दी फैसला हो रहा है। 
प्रमाणों के साथ नहीं हो रही है FIR दर्ज, 
और एक झूठे ट्वीट से मुकदमा दर्ज हो। 
वो लोकतंत्र का गला घोंट रहा है।। 

बेगुनाह और सत्यवादी जा रहे हैं जेल के अंदर, 
गुनहगारों और असत्यवादियों का स्वागत हो रहा है। 
संविधान की हत्या संविधान के रक्षक कर रहे हैं, 
लोकतंत्र ICU में लेटा रो रहा है। 
वो लोकतंत्र का गला घोंट रहा है।।

अभी भी वक्त है बचा लो संविधान को, 
क्योंकि वो और तेज़ी से उसकी सांसे रोक रहा है। 
वो लोकतंत्र का गला घोंट रहा है।।

स्वरचित
स्वाति नेगी

तुझसे....

मन करता है तुझसे सवाल पूछूं
पर लब खुलते हैं, ज़ुबान रुक जाती है।।

तू करेगा तो अच्छा ही करेगा, 
बस यही तसल्ली दिल को कराते हैं, 
रात के बाद फिर सुबह होगी, 
बस यही ढांढस दिल को बंधाते हैं, 
फिर जब उम्मीद टूटती है तो, 
मन करता है तुझसे बात करूं 
पर लब खुलते हैं जुबान रुक जाती है।।

हर रुकावट को तेरा फैसला समझ कर, 
खुद को बहलाते हैं, 
खुद को और मजबूत कर कर, 
तेरी पहेलियां सुलझाते हैं, 
फिर जब नहीं सुलझती तो, 
मन करता है तुझसे लडूं, 
पर लब खुलते हैं ज़ुबान रुक जाती है।।

थक जाते हैं लड़ते-लड़ते, 
हौसला जवाब देने लगता है,
मेरे हौसलों का पुलिंदा भी, 
फिर ढहने लगता है, 
फिर जब आखिरी लौ भी बुझ जाती है तो,
 मन करता है... अब जुबान के साथ-साथ कलम भी रुक जाती है।।

{मुझे नहीं पता, ना जानना है, ना मेरी मर्जी चल रही है ना तेरी मर्जी, तो यह चल क्या रहा है!? और कब तक? रोको इसे या मुझे। फैसला तुम्हारा या फिर हमारा चुनना तुम्हें है}

स्वरचित 
स्वाति नेगी

Saturday, 3 October 2020

तितली

डाल_डाल हर पात_पात, फूल_फूल हर बाग_बाग
मैं जाती हूँ _ इठलाती हूँ, मैं सबके मन को भाती हूँ |

कभी इधर_इधर, कभी उधर_उधर, 
न जाने जाऊँ किधर_किधर,
यूं डोलूं मैं, तो बोलूं मैं, 
हर रंग गये है बिखर_बिखर,
वसंत आया झूम_झूम कर, बस यही संदेश सुनाती हूँ |
मैं सबके मन को भाती हूँ |

हर फूल खिला, खिला गुलशन, 
लग रही है बगिया एक दुल्हन, 
अब चलने लगी है पुरवैया,
और चंचल हो गयी चितवन, 
मैं देख ये पावन सुन्दरता, मन्द_मन्द मुस्काती हूँ |
मैं सबके मन को भाती हूँ |

हर गीत सुनूं मैं मौसम के, 
हर साज़ छेडूं मैं सावन के, 
सुन्दर_सुन्दर चमकती हरियाली, 
कुछ मीठे छींटे बारिश के, 
सौंधी_सौंधी मिट्टी की महक, मैं खुशियों से भर जाती हूँ |
मैं सबके मन को भाती हूँ |

एक दिन की ज़िन्दगानी मेरी, 
एक दिन का ही फ़साना है, 
एक दिन में ही पूरा जीवन मेरा, 
जिसे मुझे खुशियों से बिताना है,
बस अब यही तराना हर क्षण मैं तो गाती जाती हूँ |
मैं सबके मन को भाती हूँ |

मैं हर पल खुश हो जाती हूँ |
मैं सबके मन को भाती हूँ |


                         स्वरचित
                       स्वाती नेगी

Thursday, 10 September 2020

एक सच्चा प्यार

नजारा तुम देखो, आँखें मेरी हो |
नव्ज तुम्हारी चले, तो साँसे मेरी हो |
हम-तुम कुछ मिलें इस तरह, 
कि दिल तुम्हारा धड़के, तो धड़कन मेरी हो |

हवाओं का इशारा है, कि तुमने हर जर्रा सवारा है 
ये आशिकि हमारी कुबूल कर लो, 
हमें दिल में बसाने की ज़रा सी भूल कर लो 
हम परिंदे नहीं जो उड़ जायेंगे 
हम तुम्हारी महफिल के वो परवाने हैं, 
जिधर श़मा(तुम) जलेगी, उधर ही मुड़ जाएंगे 

इस इश्क के समन्दर में,
किश्ती तुम्हारी उतरे तो पतवार मेरी हो |
नजारा तुम देखो, आँखें मेरी हो |
नव्ज तुम्हारी चले, तो साँसे मेरी हो |

न धरती में न अंबर में, सुकून मिलता नहीं बिन तेरे 
तूफान भी अब ज़ोरों पर है, ये मेरी मुहब्बत का असर है
सम्भल कर डोर थामे रखना, 
और थोड़ा इतमीनान रखना
ये बस कुछ पल का खेल है, 
होने वाला दो दिलों का मेल है
बस इतना पाक हो हमारा रिश्ता, 
कि खुशियाँ तुमको मिले, मुस्कान मेरी हो |
नजारा तुम देखो, आँखें मेरी हो |
नव्ज तुम्हारी चले, तो साँसे मेरी हो |
 
                        स्वरचित
                       स्वाति नेगी

Monday, 17 August 2020

गौ रक्षक

गौ रक्षा के कसीदे पढ़ने वाले लोग गौ रक्षा के नाम पर आंदोलन करते है लेकिन जब गौ संरक्षण की बात आती है तो सब न जाने कहा विलुप्त हो जाते है। लोग धर्म के नाम पर गौ रक्षा का ढिंढोरा पीटते रहते है पर जब ऐसे मसले सामने आते है तो इन लोगों की ढोल की पोल खुल जाती है। जहाँ एक तरफ गाय को माँ का दर्जा देने वाला हिन्दू समाज ही जब उसकी रक्षा के लिए आगे नहीं आना चाहता तो राष्ट्रीय माता का दर्जा दिलाने का कोई औचित्य सिद्ध नहीं होता। आजकल ये एक प्रथा बन चुकी है कि सबके आगे माँ जोड़ देने से ही सम्मान होता है जैसे भारत माँ , गंगा माँ , गौ माँ इत्यादि, पर असल में सम्मान किसका होता है? यह एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है भारत माता पर लोग देशविरोधी गतिविधियों में भाग लेकर वार करते है, गंगा माता में पाप भी धोते है और कचरा फेक कर गन्दा करते है और गाय माता को मात्र एक साधन बनाया है मरते वक्त स्वर्ग जाने का शादी के वक्त गो दान का, गौ मूत्र , गोबर , दुग्ध उत्पादन का भोग करने के लिए। हालांकि कांजी हाउस नाम की जगह आवारा गाय के लिए सरकार द्वारा आवंटित की गयी थी पर वो भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है और बंद है सवाल उठता है कि सरकार ऐसे पशुओं की व्यवस्था के लिए क्या ठोस कदम उठा रही है या सरकार की नीतियों को कुछ भ्रष्ट नेता पूरा नहीं होने दे रहे। खैर कांजी हॉउस का बंद होना बहुत चिंता का विषय है।आज बड़ी खुशी हुई के मुस्लिम धर्म के लोग गौ सेवा के लिए आगे आये उम्मीद है कुछ हिन्दुओ का भी दिल पिघले। आकृति प्राणी सेवा संस्थान की सुषमा जखमोला दीदी जैसे लोगो ने आज भी गौ रक्षा के लिए तत्पर है हम सबको इनका साथ देना चाहिए। इस मौके पर सुषमा जखमोला जी, श्री जखमोला जी, स्वाति नेगी, अमरदीप व अन्य स्थानीय लोग मौजूद थे। ये घटना रेलवे स्टेशन के नीचे लकड़ी पड़ाव की है जो काशीरामपुर के समीप है। मौके पर सुषमा जखमोला जी के द्वारा डॉक्टर को बुलाया गया तथा first-aid दिया गया।
Article by
स्वाति नेगी

Sunday, 12 August 2018

Sunday, 15 July 2018

Life quotes

This is not about what life choose for you, this is about what you choose for life.
           Swati Negi

Saturday, 14 July 2018

Unplanned life

Life is unplanned dont waste your time on planning just go with the flow and go with the flow and enjoy the moments and also be ready for surprises.
                                            Swati Negi

Wednesday, 23 November 2016

ज़िन्दगी की आँख मचोली

जिंदगी पल भर के लिए बैठती है मेरे पास,
हँस के मेरा हाल पूछ कर चली जाती है।
खुद ही दर किनार करती ही मुझे खुद से,
जो हो जाऊ तो फिर हसीन मंजर दिखा जाती है।

क्यों वो खेल रही है मुझसे,
खो-खो , कबड्डी जैसे,
गिरते, उठते, सँभलते,
मुझे देखना चाह रही हो जैसे,
एक उम्मीद जो मुझे जीना सिखाये,
हर बार वो एक उम्मीद मुझे दे जाती है,
और हँस के मेरा हाल पूछ कर चली जाती है।

कुछ कारवाँ चल पड़ा है अरमानों का,
काफ़िले भी बन गए है अपने अपने,
उथल-पुथल हो गया है सब कुछ,
अब हम छाँट रहे है हक़ीक़त और सपने,
हकीकत हमें पसंद नहीं,
तो वो सपनों से मन बहला जाती है,
वो फिर से हँस के मेरा हाल पूछ कर चली जाती है।

                           स्वरचित

                         स्वाति नेगी

Sunday, 2 October 2016

कल तक जो हाथ बंधे थे,
अब उनकी बेड़िया खुल चुकी है।
बरसों से दोस्ती का खंज़र थे तुम छुपाये,
अब बातचीत की सारी हदे टूट चुकी है।

अब गिन-गिन के हिसाब होगा
और यकीन मनना बेहिसाब होगा
तुम छुप के 17 मारोगे,
हम खुल के हज़ार मारेंगे,
तुम समझे तुम जीत जाओगे,
हम तुम्हे जीत का असली मतलब समझाएंगे,
वो दिन गए जब तुम हमारा सिर काट कर ले गए थे
अब तो तुम्हारे सिर कलम करने की तैयारी हो चुकी है।
कल तक जो हाथ बंधे थे,
अब उनकी बेड़िया खुल चुकी है।।

अगर आँख फिर से उठायी,
तो अब आँख न रहेगी,
होगा पंच में विलीन तू
कोई निशानी न रहेगी,
ये देश होगा तेरे लिए मेरे लिये मेरी माँ है,
मेरे वतन पे एक वार, और तेरी कहानी न रहेगी,
पाकिस्तान तू ले रहा है जिन आतंकियों का सहारा,
जो हमने हमला कर दिया तो तेरी ज़मात न रहेगी,
थे बंधे हाथ अब तक तो तू हवा में उड़ रहा था
अब शेरों की टोली शिकार पर निकल चुकी है।
कल तक जो हाथ बंधे थे,
अब उनकी बेड़िया खुल चुकी है।।

                      स्वरचित
                    स्वाति नेगी

सेना को समर्पित

कल तक जो हाथ बंधे थे,
अब उनकी बेड़िया खुल चुकी है।
बरसों से दोस्ती का खंज़र थे तुम छुपाये,
अब बातचीत की सारी हदे टूट चुकी है।

अब गिन-गिन के हिसाब होगा
और यकीन मनना बेहिसाब होगा
तुम छुप के 17 मारोगे,
हम खुल के हज़ार मारेंगे,
तुम समझे तुम जीत जाओगे,
हम तुम्हे जीत का असली मतलब समझाएंगे,
वो दिन गए जब तुम हमारा सिर काट कर ले गए थे
अब तो तुम्हारे सिर कलम करने की तैयारी हो चुकी है।
कल तक जो हाथ बंधे थे,
अब उनकी बेड़िया खुल चुकी है।।

अगर आँख फिर से उठायी,
तो अब आँख न रहेगी,
होगा पंच में विलीन तू
कोई निशानी न रहेगी,
ये देश होगा तेरे लिए मेरे लिये मेरी माँ है,
मेरे वतन पे एक वार, और तेरी कहानी न रहेगी,
पाकिस्तान तू ले रहा है जिन आतंकियों का सहारा,
जो हमने हमला कर दिया तो तेरी ज़मात न रहेगी,
थे बंधे हाथ अब तक तो तू हवा में उड़ रहा था
अब शेरों की टोली शिकार पर निकल चुकी है।
कल तक जो हाथ बंधे थे,
अब उनकी बेड़िया खुल चुकी है।।

                      स्वरचित
                    स्वाति नेगी

Friday, 30 September 2016

वक्त की हेरा फेरी

आज फिर मैं तन्हा महसूस कर रही थी।
जहाँ से चली थी मैं आज फिर वही थी।
थी आरजू जो गुमनामी के अंधेरों में खो रही थी।
वो मेरी चाहतों के बाजुओं में दम तोड़ रही थी।
एक टीस बनकर रह गयी तेरी यादें,
कुछ अच्छी, कुछ बुरी में सभी निचोड़ रही थी।
था जाम भरा अच्छी यादों से मेरा,
एक बुरी याद जब ज़हर बनकर उसमें मिली थी।
जो चेहरे पर मेरे हँसी की सलवटें थी,
वो उदासी में करवटे बदल रही थी।

किसी ने पुकारा था मुझे अपनी बाह खोले,
वादा किया था भर देगा ख़ुशी से झोले,
हाँ वादा निभाया उसने काफी हद तक,
दिया साथ मेरा उसने आधे सफर तक,
मेरी मुस्कराहट पतझड़ के जैसे झड़ रही थी।
वो कल से अब तक के बीच लड़ रही थी।

लगा मैंने एक खूबसूरत ख़्वाब देखा,
जो टूट गया जो मैंने आँख खोली,
सोचा रो लू पर आँख से आँसू न निकला,
क्योंकि मुझे भी पता था ख़्वाब था हसीन पर उम्र थी थोड़ी,
मुझे लगा मेरे हाथ में गुलाब का सुर्ख लाल रंग है,
पता चला वो तो काँटों से मेरी हथेली रंग रही थी।
मैं जिसको रंग समझी वो खून से मुझे सन रही थी।

ये एहसास भी जरुरी था, ये अंजाम भी जरुरी था,
क्योंकि मैं अपने मुकद्दर से लड़ रही थी।
भूल गयी थी कठपुतली हूँ मैं भी मुकद्दर की,
मैं अपनी ख्वाहिशों से ज्यादा ऊँची उड़ रही थी।

                                  स्वरचित
                                 स्वाति नेगी

Wednesday, 17 August 2016

गौ रक्षा का सच

गौ रक्षा के कसीदे पढ़ने वाले लोग गौ रक्षा के नाम पर आंदोलन करते है लेकिन जब गौ संरक्षण की बात आती है तो सब न जाने कहा विलुप्त हो जाते है। लोग धर्म के नाम पर गौ रक्षा का ढिंढोरा पीटते रहते है पर जब ऐसे मसले सामने आते है तो इन लोगों की ढोल की पोल खुल जाती है। जहाँ एक तरफ गाय को माँ का दर्जा देने वाला हिन्दू समाज ही जब उसकी रक्षा के लिए आगे नहीं आना चाहता तो राष्ट्रीय माता का दर्जा दिलाने का कोई औचित्य सिद्ध नहीं होता। आजकल ये एक प्रथा बन चुकी है कि सबके आगे माँ जोड़ देने से ही सम्मान होता है जैसे भारत माँ , गंगा माँ , गौ माँ इत्यादि, पर असल में सम्मान किसका होता है? यह एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है भारत माता पर लोग देशविरोधी गतिविधियों में भाग लेकर वार करते है, गंगा माता में पाप भी धोते है और कचरा फेक कर गन्दा करते है और गाय माता को मात्र एक साधन बनाया है मरते वक्त स्वर्ग जाने का शादी के वक्त गो दान का, गौ मूत्र , गोबर , दुग्ध उत्पादन का भोग करने के लिए। हालांकि कांजी हाउस नाम की जगह आवारा गाय के लिए सरकार द्वारा आवंटित की गयी थी पर वो भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है और बंद है सवाल उठता है कि सरकार ऐसे पशुओं की व्यवस्था के लिए क्या ठोस कदम उठा रही है या सरकार की नीतियों को कुछ भ्रष्ट नेता पूरा नहीं होने दे रहे। खैर कांजी हॉउस का बंद होना बहुत चिंता का विषय है।आज बड़ी खुशी हुई के मुस्लिम धर्म के लोग गौ सेवा के लिए आगे आये उम्मीद है कुछ हिन्दुओ का भी दिल पिघले। आकृति प्राणी सेवा संस्थान की सुषमा जखमोला दीदी जैसे लोगो ने आज भी गौ रक्षा के लिए तत्पर है हम सबको इनका साथ देना चाहिए। इस मौके पर सुषमा जखमोला जी, श्री जखमोला जी, तृष्णा वेलफेयर सोसाइटी की स्वाति नेगी, अमरदीप व अन्य स्थानीय लोग मौजूद थे। ये घटना रेलवे स्टेशन के नीचे लकड़ी पड़ाव की है जो काशीरामपुर के समीप है। मौके पर सुषमा जखमोला जी के द्वारा डॉक्टर को बुलाया गया तथा first-aid दिया गया।
Article by
स्वाति नेगी

Friday, 5 August 2016

सिक्के के दो पहलू

उसके कपडे बहुत कुछ कह गए।

कोहनी के पास फटा हुआ था,
उसका मुँह भी लटका हुआ था,
पेंट भी घुटनो का झरोखा बन गयी,
ढीली थी कमर इसलिए low waist बन गयी,
कमीज का एक बाजू नही था,
बटन नहीं थे पर काज सही था,
उसकी आँखों में वो एहसास नहीं था,
जकड़ लिया हीन भावना ने उसे,
क्योंकि उससे किसी को प्यार नहीं था,

वही दूसरी तरफ

वो रगड़ रहे थे जैकेट कोहनी दिखाने को,
Jeans भी काट डाली घुटने दिखाने को,
Low waist का fashion सर चढ़ कर बोल रहा था,
और कोई अपनी jeans घुटनो तक मोड़ रहा था,
उनकी भाषा में इसे style कहते है,
क्योंकि वो लोग swag में रहते है,

किसी की मज़बूरी किसी के लिये  अदा बन गए,

उसके कपडे बहुत कुछ कह गए।।।
     
                 स्वरचित
               स्वाति नेगी

Saturday, 30 July 2016

Ray Of Hope

Oh God you always gave me,
A ray of hope, a ray of hope.

Yes I was surrounded by lots of enemies,
Most of them was my best buddies,
Oh yes how fool was I ,
They were in front of me and I closed eyes,
You make me awake timely
Oh God you always gave me,
A ray of hope , a ray of hope.

I was suffering through heart-break,
All the moments I captured was fake,
I feel myself in the depth of dark,
I was wondering that I had no one to talk ,
There were unbelievable facts in front of me,
Oh God you always gave me,
A ray of hope , a ray of hope.

It happens continuously with my life,
My friends my relatives no one was my side,
No one accept that I am innocent,
A painful experience and my mind goes blank,
But after sometimes I feel happy,
Because you were always there for me,
Oh God you always gave me,
A ray of hope , a ray of hope.